अकाउंटिंग क्या है और ये क्यों ज़रूरी है
मीरा हल्द्वानी बस स्टैंड पर बस से उतरी, उसकी पीठ पर भारी बैकपैक था जिसमें नोटबुक्स और एक पानी की बोतल थी। उसके हाथ में एक प्रिंटेड लेटर था — शर्मा सर के CA दफ़्तर में ट्रेनी के तौर पर जॉइन करने का पेशकश। उसे पता नहीं था कि CA पूरे दिन करता क्या है। उसे "अकाउंटिंग" का मतलब भी ठीक से नहीं पता था। लेकिन उसके पापा ने कहा था, "मीरा, ये सीख लो तो नौकरी पक्की है।" तो बस वो यहाँ थी, बाज़ार के पीछे एक तंग गली में चलते हुए, एक छोटा नीला बोर्ड ढूँढ रही थी जिस पर लिखा था: V.K. Sharma & Associates, Chartered Accountants।

मीरा की पहली सुबह
मीरा ने दफ़्तर एक स्टेशनरी शॉप के ऊपर पहली मंज़िल पर ढूँढ लिया। छोटा सा कमरा था — तीन डेस्क, एक प्रिंटर, और मोटी-मोटी फ़ाइल्स से भरी अलमारियाँ। एक छत का पंखा धीरे-धीरे डोल रहा था।
एक नौजवान ने कंप्यूटर से ऊपर देखा। "तुम मीरा हो? मैं नेगी हूँ। आओ, यहाँ बैठो। शर्मा सर 11 बजे तक आएँगे।"
मीरा एक प्लास्टिक कुर्सी पर बैठ गई और इधर-उधर देखने लगी। नंबर। हर तरफ़ नंबर। दीवार पर टेप की हुई प्रिंटआउट्स। एक कैलेंडर जिसमें टैक्स की तारीख़ें लाल रंग से गोल की हुई थीं। कागज़ों के ढेर जिनमें रोज़ और कॉलम्स थे।
"नेगी भैया, ये सब क्या है?" उसने पूछा।
नेगी मुस्कुराया। "ये? ये अकाउंटिंग है। यहाँ हर नंबर किसी के बिज़नेस की कहानी बताता है — कितना कमाया, कितना ख़र्च किया, कितना टैक्स भरना है।"
मीरा ने पलकें झपकाईं। "लेकिन... क्या ये बस नंबर लिखना नहीं है?"
नेगी ने सिर हिलाया। "ज़्यादातर लोग यही सोचते हैं। लेकिन बस नंबर लिखने और अकाउंटिंग करने में बहुत बड़ा फ़र्क़ है। तुम जल्दी समझ जाओगी।"
अकाउंटिंग क्या है?
ठीक 11 बजे शर्मा सर आए। लंबे क़द के आदमी, चाँदी जैसे बाल, गले में चेन से लटका चश्मा, और चेहरे पर शांत मुस्कान। हाथ में स्टील का टिफ़िन और अख़बार।
"अरे, मीरा! आओ, आओ। बैठो, बैठो। नेगी, चाय लाओ।"
चाय आने के बाद शर्मा सर ने अपनी कुर्सी क़रीब खींची।
"तो, मीरा। बताओ। क्या तुम अपने पैसों का हिसाब रखती हो?"
मीरा ने एक पल सोचा। "हाँ सर। जब पापा महीने के पैसे देते हैं, तो मैं लिखती हूँ — बस का किराया, नोटबुक्स, खाना।"
"बहुत अच्छा! तुम्हारी वो छोटी सी नोटबुक — वही अकाउंटिंग की शुरुआत है। तुम हिसाब रख रही हो कि पैसा कहाँ से आया और कहाँ गया।"
उन्होंने एक पेन उठाया और कागज़ पर लिखा:
अकाउंटिंग = बिज़नेस में आने वाले और जाने वाले हर पैसे का पूरा, व्यवस्थित हिसाब रखना — ताकि तुम्हें हमेशा पता रहे कि पैसा कहाँ है और बिज़नेस कैसा चल रहा है।
"बस इतना?" मीरा ने पूछा।
"इसकी जान यही है," शर्मा सर ने कहा। "लेकिन की वर्ड है व्यवस्थित। कोई भी डायरी में नंबर लिख सकता है। अकाउंटिंग का मतलब है उन्हें एक सिस्टमैटिक तरीक़े से लिखना — कुछ नियमों का पालन करते हुए — ताकि वो जानकारी काम की हो।"

तुम्हारा निजी खाता vs बिज़नेस का खाता
शर्मा सर पीछे झुके। "मीरा, तुम्हारी वो पर्सनल नोटबुक जिसमें तुम ख़र्चे लिखती हो — वो तुम्हारा निजी खाता है। तुम्हारे लिए काम करता है क्योंकि तुम्हारी ज़िंदगी सीधी-सादी है। पैसे का एक सोर्स: पापा। कुछ ख़र्चे: बस, खाना, किताबें।"
"लेकिन एक बिज़नेस? एक छोटी सी किराना दुकान भी? उसमें रोज़ सैकड़ों चीज़ें होती हैं।"
उन्होंने उँगलियों पर गिनाया:
- सामान ख़रीदना — दुकान अलग-अलग आपूर्तिकर्ता से चावल, दाल, साबुन, तेल ख़रीदती है।
- सामान बेचना — ग्राहक हर घंटे चीज़ें ख़रीदते हैं।
- बिल भरना — बिजली, किराया, फ़ोन।
- उधार देना — कुछ ग्राहक कहते हैं "लिखो, बाद में दूँगा।"
- उधार लेना — दुकानदार होलसेलर से सामान लेकर कहता है "अगले हफ़्ते पेमेंट करूँगा।"
- तनख़्वाह देना — अगर दुकान में कोई मददर है।
- टैक्स भरना — GST, आमदनी टैक्स।
- लोन लेना — शायद बैंक से, दुकान बढ़ाने के लिए।
"अगर तुम ये सब एक डायरी में बिना किसी सिस्टम के लिखो, तो एक हफ़्ते में गड़बड़ हो जाएगी," शर्मा सर ने कहा।
| तुम्हारा निजी खाता | बिज़नेस का खाता (अकाउंटिंग) |
|---|---|
| पैसे का एक सोर्स (पॉकेट मनी, तनख़्वाह) | कई सोर्स (सेल्स, लोन्स, ब्याज) |
| कुछ ख़र्चे | रोज़ सैकड़ों ट्रांज़ैक्शन्स |
| सिर्फ़ तुम्हें चाहिए | सरकार, बैंक, और साझेदार को भी चाहिए |
| कोई नियम नहीं — जैसे मन करे लिखो | नियम ज़रूरी हैं (ताकि सब समझ सकें) |
| ग़लतियों से ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ता | ग़लतियों का मतलब हो सकता है ग़लत टैक्स, पेनल्टी, या नुक़सान |
"तो अकाउंटिंग मेरी पर्सनल नोटबुक जैसी है," मीरा ने धीरे से कहा, "लेकिन नियमों के साथ, और बिज़नेस के लिए।"
"बिल्कुल सही," शर्मा सर ने कहा।
फटी हुई नोटबुक — रावत आंटी की विज़िट
तभी दफ़्तर का दरवाज़ा खुला और एक औरत अंदर आई, थोड़ी हाँफ रही थी। सादी सलवार-कमीज़ पहनी थी और हाथ में एक कपड़े का थैला था।
"शर्मा जी! मुझे मदद चाहिए। बैंक मेरे अकाउंट्स माँग रहा है। मेरे पास कोई अकाउंट्स नहीं हैं। मेरे पास बस ये है।"
उसने थैले से एक पुरानी-सी नोटबुक निकाली। कवर फटा हुआ था। पन्ने गिर रहे थे। कुछ एंट्रीज़ पेंसिल में थीं, कुछ पेन में, कुछ नीली इंक में, कुछ लाल में। कई जगह तारीख़ें नहीं थीं। नाम छोटे करके लिखे थे। कुछ पन्नों पर चाय के दाग़ नंबरों को ढक रहे थे।
ये थीं रावत आंटी — वो रावत जनरल स्टोर चलाती थीं, अल्मोड़ा में एक किराना दुकान।
शर्मा सर ने नोटबुक ध्यान से खोली। "रावत जी, देखता हूँ..."
उन्होंने कुछ पन्ने पलटे और ज़ोर से पढ़ा:
- "रमेश — 500" (कौन रमेश? 500 किसके? कब?)
- "तेल — 2000" (कौन सा तेल? ख़रीदा या बेचा? किससे?)
- "नक़द — 15000" (नक़द आया या गया? किस तारीख़ को?)

शर्मा सर ने प्यार से आह भरी। "रावत जी, मैं समझता हूँ। तुम चीज़ें लिखती रही हो। ये अच्छी बात है। लेकिन ये अकाउंटिंग नहीं है। ये बस... नोट्स हैं। मैं फ़र्क़ दिखाता हूँ।"
उन्होंने नेगी को बुलाया। "नेगी, रावत जी को बिश्त ट्रेडर्स का लेजर दिखाओ।"
नेगी ने अपना कंप्यूटर खोला और स्क्रीन रावत आंटी की तरफ़ घुमाई। उसमें एक साफ़-सुथरी, व्यवस्थित टेबल थी:
| तारीख़ | विवरण | पैसा आया (₹) | पैसा गया (₹) | बाक़ी (₹) |
|---|---|---|---|---|
| 01-Apr-2025 | ओपनिंग बैलेंस | — | — | 50,000 |
| 02-Apr-2025 | गुप्ता स्टोर को हल्दी बेची | 12,000 | — | 62,000 |
| 03-Apr-2025 | देहरादून के आपूर्तिकर्ता से जीरा ख़रीदा | — | 8,000 | 54,000 |
| 05-Apr-2025 | बिजली का बिल भरा | — | 1,200 | 52,800 |
| 06-Apr-2025 | मेहता किराना से पेमेंट मिली | 5,000 | — | 57,800 |
रावत आंटी टकटकी लगाकर देखती रहीं। "ये तो बहुत साफ़ है। मुझे दिख रहा है कि क्या हो रहा है।"
"हाँ," शर्मा सर ने कहा। "किसी भी वक़्त तुम बता सकती हो कि कितना पैसा है। कौन तुम्हारा पैसा देना है। तुम्हें किसे पैसा देना है। तुम्हारा बिज़नेस फ़ायदे में है या नुक़सान में।"
"और ये," उन्होंने रावत आंटी की फटी नोटबुक की तरफ़ इशारा किया, "कुछ नहीं बताती।"
रावत आंटी शर्मिंदा हुईं। "लेकिन मैं तो बस एक छोटी दुकानदार हूँ..."
शर्मा सर ने हाथ उठाया। "छोटी से छोटी दुकान को भी सही अकाउंट्स चाहिए। बताता हूँ क्यों।"
एक छोटी किराना दुकान को भी अकाउंटिंग क्यों चाहिए
शर्मा सर ने और चाय डाली और आराम से बैठे। मीरा ने एक नई नोटबुक निकाली सब लिखने के लिए।
"पाँच बड़ी वजहें हैं कि हर बिज़नेस को — चाहे कितना भी छोटा हो — सही हिसाब-किताब रखना ज़रूरी है।"
वजह 1: पता चले कि कमा रहे हो या गँवा रहे हो
"रावत जी, सच-सच बताओ — तुम्हारी दुकान फ़ायदे में है?"
रावत आंटी हिचकिचाईं। "लगता तो है... मतलब, पैसा तो रोज़ आता है..."
"लेकिन क्या तुम्हें पता है हर महीने कितना ख़र्च होता है? सामान ख़रीदने पर, किराए पर, बिजली पर, ट्रांसपोर्ट पर?"
उन्होंने सिर हिलाया।
"बिना सही अकाउंट्स के, तुम्हें लगता है कि कमा रही हो, लेकिन असल में धीरे-धीरे नुक़सान हो रहा हो। कई छोटी दुकानें इसलिए बंद हो जाती हैं क्योंकि मालिक को कभी पता ही नहीं चला कि वो कमाने से ज़्यादा ख़र्च कर रहा था।"
बिना अकाउंट्स के ख़तरा: पिथौरागढ़ में एक दुकानदार ने शर्मा सर को बताया कि उसका बिज़नेस "अच्छा चल रहा है।" जब बैठकर ठीक से हिसाब लगाया, तो पता चला कि दुकान दो साल से हर महीने ₹3,000 का नुक़सान कर रही थी। मालिक धीरे-धीरे अपनी बचत ख़र्च कर रहा था बिना इसका एहसास किए।
वजह 2: बैंक से लोन मिले
"तुम आज मेरे पास इसलिए आई हो क्योंकि बैंक ने अकाउंट्स माँगे हैं। बैंक को लोन देने से पहले तुम्हारे अकाउंट्स देखने होते हैं। वो जानना चाहते हैं: क्या ये बिज़नेस ठीक चल रहा है? क्या ये इंसान पैसा वापस कर सकता है?"
"बिना सही अकाउंट्स के, बैंक तुम पर भरोसा नहीं कर सकता। तुम्हारी लोन एप्लिकेशन ख़ारिज हो जाएगी।"
वजह 3: सही टैक्स भरो
"सरकार बिज़नेसेज़ से टैक्स लेती है। अगर तुम रिकॉर्ड नहीं रखतीं, तो दो चीज़ें हो सकती हैं:"
- ज़्यादा टैक्स भरो — क्योंकि तुम अपने ख़र्चे प्रूव नहीं कर सकतीं, तो सरकार मान लेती है कि तुमने ज़्यादा कमाया।
- कम टैक्स भरो — ग़लती से, और फिर सरकार पेनल्टी (सज़ा के तौर पर एक्स्ट्रा पैसे) लगाती है।
"दोनों ख़राब हैं। सही अकाउंट्स का मतलब है कि तुम बिल्कुल सही रक़म भरो। न एक रुपया ज़्यादा, न एक रुपया कम।"
वजह 4: उधार का हिसाब रखो
"रावत जी, अभी कितने ग्राहकों पर तुम्हारा पैसा बाक़ी है?"
रावत आंटी ने सोचा। "शायद... पंद्रह? बीस?"
"कुल कितना?"
"मुझे... पक्का नहीं पता।"
"देखो? तुमने लोगों को उधार पर सामान दिया है और तुम्हें पता भी नहीं कि कितना देना है। वो तुम्हारा पैसा है। बिना हिसाब के, कुछ लोग भूल जाएँगे — या भूलने का नाटक करेंगे।"
वजह 5: बेहतर फ़ैसले लो
"अगर तुम अच्छे अकाउंट्स रखो, तो ऐसे सवालों के जवाब मिल सकते हैं:"
- कौन सा सामान सबसे ज़्यादा बिकता है?
- किस महीने सबसे ज़्यादा सेल होती है?
- क्या मैं ट्रांसपोर्ट पर बहुत ज़्यादा ख़र्च कर रही हूँ?
- इस चीज़ का स्टॉक ज़्यादा रखूँ या कम?
"अकाउंटिंग तुम्हें जानकारी देती है। जानकारी से फ़ैसले लेने में मदद मिलती है। अच्छे फ़ैसलों से बिज़नेस बढ़ता है।"

रावत आंटी ने धीरे-धीरे सिर हिलाया। "शर्मा जी, अब समझ आया। लेकिन शुरू कहाँ से करूँ?"
शर्मा सर मुस्कुराए। "चिंता मत करो। हम मदद करेंगे। असल में, मीरा यहाँ चरण बाय चरण अकाउंटिंग सीखेगी। और जैसे-जैसे वो सीखेगी, तुम्हारी बुक्स भी सँभालेंगे।"
उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा। "मीरा, तुमने अभी अपना पहला लेसन सुना। चलो पक्का करें कि तुम ठीक से समझी हो।"
बस नंबर लिखना vs असली अकाउंटिंग
मीरा ज़ोर-शोर से नोट्स लिख रही थी। शर्मा सर ने गौर किया और बोले, "अच्छा। अब मैं फ़र्क़ बिल्कुल साफ़ कर देता हूँ।"
| बस नंबर लिखना | असली अकाउंटिंग |
|---|---|
| कोई तय फ़ॉर्मेट नहीं — कहीं भी, कैसे भी लिखो | तय फ़ॉर्मेट — हर एंट्री में तारीख़, विवरण, और रक़म |
| कोई नियम नहीं कि क्या लिखना है | नियम बताते हैं कि हर तरह का ट्रांज़ैक्शन कैसे लिखना है |
| सिर्फ़ लिखने वाला समझता है (कभी-कभी वो भी नहीं!) | अकाउंटिंग जानने वाला कोई भी पढ़ और समझ सकता है |
| फ़ायदा-नुक़सान आसानी से गणना नहीं हो सकता | फ़ायदा-नुक़सान कभी भी गणना हो सकता है |
| बैंक, सरकार, या साझेदार को दिखा नहीं सकते | किसी को भी दिखा सकते हो — ये एक स्टैंडर्ड भाषा है |
| नंबर शायद मिलें, शायद न मिलें | नंबर मिलने ही चाहिए — इसमें बिल्ट-इन चेक्स हैं |
"इसे ऐसे सोचो," शर्मा सर ने कहा। "तुम जानती हो डॉक्टर्स प्जोखिम्रिप्शन कैसे लिखते हैं?"
"हाँ, उस भयंकर हैंडराइटिंग में," मीरा हँसी।
"बिल्कुल। लेकिन हैंडराइटिंग ख़राब होने के बावजूद, इंडिया का हर फ़ार्मासिस्ट उसे पढ़ सकता है। क्यों? क्योंकि एक सिस्टम पालन होता है। दवा का नाम, डोज़, कितनी बार लेनी है — ये हमेशा एक तय फ़ॉर्मेट में होता है। अकाउंटिंग भी बिज़नेस के नंबरों के साथ यही करती है। एक ऐसा सिस्टम बनाती है जिसे सब पालन कर सकें।"
जब अकाउंट्स नहीं रखते तो क्या होता है
शर्मा सर गंभीर हो गए। "मैं तुम्हें कुछ असली समस्याएँ बताता हूँ जो मैंने तीस साल CA रहते हुए देखी हैं।"
समस्या 1: टैक्स नोटिस और पेनल्टी
"रुद्रपुर में एक दुकानदार ने कभी कोई रिकॉर्ड नहीं रखे। एक दिन उसे आमदनी टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस आया। उन्होंने उसकी आमदनी ₹12 लाख एस्टिमेट की और उस पर टैक्स माँगा। उसकी असली आमदनी सिर्फ़ ₹4 लाख थी — लेकिन उसके पास प्रूव करने के लिए कोई रिकॉर्ड नहीं थे। उसे ₹12 लाख पर टैक्स भरना पड़ा, प्लस पेनल्टी।"
समस्या 2: लोन रिजेक्शन
"काशीपुर में एक औरत अपना टेलरिंग बिज़नेस बढ़ाना चाहती थी। वो बैंक गई ₹2 लाख का लोन लेने। बैंक ने अकाउंट्स माँगे। उसके पास कुछ नहीं था। लोन ख़ारिज। उसका बिज़नेस अच्छा था, लेकिन वो कागज़ पर प्रूव नहीं कर सकी।"
समस्या 3: साझेदारी में झगड़े
"रामनगर में दो भाई मिलकर एक हार्डवेयर शॉप चलाते थे। कोई सही अकाउंट्स नहीं। पाँच साल बाद ज़बरदस्त लड़ाई। एक बोला 'मैंने ज़्यादा पैसा लगाया।' दूसरा बोला 'नहीं, मैंने।' कोई रिकॉर्ड नहीं था। परिवार टूट गया।"
समस्या 4: चोरी का पता ही नहीं चला
"हल्द्वानी में एक दुकान का मालिक था जिसका मददर रोज़ कैश बॉक्स से ₹500 चुरा रहा था। अकाउंटिंग नहीं होने की वजह से मालिक को कभी पता ही नहीं चला। ये दो साल तक चला। ₹3,65,000 का नुक़सान।"
समस्या 5: बिना वॉर्निंग के बिज़नेस डूब गया
"एक रेस्टोरेंट मालिक सोचता था कि बिज़नेस बहुत अच्छा चल रहा है क्योंकि ग्राहकों रोज़ आते थे। लेकिन उसने कभी अपने ख़र्चे ठीक से ट्रैक नहीं किए। जब तक उसे पता चला कि वो कमाने से ज़्यादा ख़र्च कर रहा है, तब तक ₹5 लाख का क़र्ज़ हो चुका था।"

मीरा ने रावत आंटी को देखा। रावत आंटी चिंतित लग रही थीं।
"चिंता मत करो," शर्मा सर ने प्यार से कहा। "ये समस्याएँ तब होती हैं जब अकाउंटिंग नहीं होती। यही तो हम ठीक करने आए हैं।"
अकाउंटिंग एक भाषा है
शर्मा सर उठे और दीवार पर लगे व्हाइटबोर्ड की तरफ़ गए।
"आज के लिए एक आख़िरी बात, मीरा। मैं चाहता हूँ कि तुम अकाउंटिंग को एक भाषा की तरह सोचो।"
"हिंदी एक भाषा है। इंग्लिश एक भाषा है। और अकाउंटिंग? ये बिज़नेस की भाषा है।"
"जैसे हिंदी में ग्रामर के नियम हैं — सब्जेक्ट, वर्ब, ऑब्जेक्ट — अकाउंटिंग में भी नियम हैं। जैसे बच्चे हिंदी के शब्द एक-एक करके सीखते हैं, वैसे ही तुम अकाउंटिंग के शब्द एक-एक करके सीखोगी।"
"और जैसे हिंदी जानने से तुम पूरे इंडिया में लोगों से बात कर सकती हो, वैसे ही अकाउंटिंग जानने से तुम दुनिया में कहीं का भी बिज़नेस समझ सकती हो।"
उन्होंने व्हाइटबोर्ड पर लिखा:
अकाउंटिंग = बिज़नेस की भाषा। ये नंबरों में बिज़नेस की कहानी बताती है। जो ये भाषा जानता है, वो किसी भी बिज़नेस की कहानी पढ़ सकता है।
"अल्मोड़ा की एक दुकान और मुंबई की एक कंपनी — दोनों एक ही अकाउंटिंग के नियम इस्तेमाल करती हैं। इसकी ख़ूबसूरती यही है। एक बार ये भाषा सीख ली, तो कहीं भी काम कर सकती हो।"
मीरा उस दिन पहली बार मुस्कुराई। भाषा तो वो सीख सकती है। उसने हिंदी सीखी है, इंग्लिश सीखी है। ये भी सीख सकती है।

मीरा का दिन का काम
रावत आंटी के जाने से पहले, शर्मा सर ने मीरा को उसका पहला काम दिया।
"मीरा, मैं चाहता हूँ कि तुम रावत आंटी के साथ दस मिनट बैठो। उनकी नोटबुक देखो। जो भी ग़लतियाँ दिखें उनकी लिस्ट बनाओ। कौन सी जानकारी ग़ायब है? क्या करने से ये बेहतर होगी?"
मीरा रावत आंटी के साथ बैठी और नोटबुक पन्ना-पन्ना देखी। दस मिनट बाद उसके पास एक लिस्ट थी:
- कई एंट्रीज़ में तारीख़ नहीं — पता नहीं चलता कब हुआ।
- पूरे नाम नहीं — बस "रमेश" या "तेल।" कौन रमेश? कौन सा तेल?
- विवरण नहीं — "500" से पता नहीं चलता कि मिला या दिया।
- सब कुछ मिला-जुला — ख़रीदना, बेचना, ख़र्चे, सब एक ही पन्ने पर बिना किसी अलगाव के।
- कोई कुल नहीं — पन्ने बस चलते जाते हैं बिना किसी मंथली कुल या रनिंग बैलेंस के।
- कुछ पन्ने ग़ायब — कुछ पन्ने फटकर निकल गए थे।
- दो अलग-अलग हैंडराइटिंग — कभी रावत आंटी ने लिखा, कभी उनके बेटे ने, अलग-अलग स्टाइल में।
- नक़द और उधार में कोई फ़र्क़ नहीं — पता नहीं चलता कि पैसा सच में आया-गया या उधार था।
शर्मा सर ने उसकी लिस्ट पढ़ी और सिर हिलाया। "शाबाश। इनमें से हर एक समस्या को अकाउंटिंग हल करती है। अगले कुछ हफ़्तों में मैं तुम्हें सिखाऊँगा कि कैसे।"
क्विक रीकैप — चैप्टर 1
अकाउंटिंग क्या है? — बिज़नेस में आने-जाने वाले पैसे का व्यवस्थित तरीक़े से हिसाब रखना।
ये बस नंबर लिखने से अलग कैसे है? — इसमें नियम हैं, तय फ़ॉर्मेट है, और ऐसी जानकारी बनती है जिसे कोई भी पढ़ और समझ सकता है।
हर बिज़नेस को ये क्यों चाहिए?
- फ़ायदा हो रहा है या नुक़सान, ये जानने के लिए
- बैंक से लोन लेने के लिए
- सही टैक्स भरने के लिए
- कौन उधार देना है और किसे उधार देना है, ट्रैक करने के लिए
- समझदारी से बिज़नेस के फ़ैसले लेने के लिए
बिना अकाउंटिंग के क्या होता है? — टैक्स पेनल्टी, लोन रिजेक्शन, झगड़े, चोरी, बिज़नेस डूबना।
मुख्य बात: अकाउंटिंग बिज़नेस की भाषा है। सीख लो, तो कहीं भी काम कर सकते हो।
अभ्यास अभ्यास — ख़ुद करके देखो
तुम्हें दुकान की ज़रूरत नहीं। अपनी ज़िंदगी या अपने घर के छोटे-मोटे ख़र्चों से ट्राई करो।
अभ्यास 1: एक ख़ाली नोटबुक लो। अगले तीन दिन, अपने घर में होने वाला हर पैसे का लेन-देन लिखो। ये फ़ॉर्मेट पालन करो:
| तारीख़ | क्या हुआ | पैसा आया (₹) | पैसा गया (₹) |
|---|---|---|---|
| उदाहरण: 12-Jun-2025 | पापा को तनख़्वाह मिली | 25,000 | — |
| उदाहरण: 12-Jun-2025 | बाज़ार से सब्ज़ी ख़रीदी | — | 200 |
कम से कम 10 एंट्रीज़ लिखो।
अभ्यास 2: तीन दिन बाद, सारे "पैसा आया" जोड़ो और सारे "पैसा गया" जोड़ो। फ़र्क़ निकालो। वो नंबर तुम्हें क्या बताता है?
अभ्यास 3: अपने शहर या गाँव की एक छोटी दुकान के बारे में सोचो। उस दुकान में रोज़ होने वाले कम से कम 8 अलग-अलग तरह के ट्रांज़ैक्शन्स की लिस्ट बनाओ। (हिंट: सामान ख़रीदना, ग्राहकों को बेचना, किराया भरना, उधार देना...)
अभ्यास 4: रावत आंटी की गंदी नोटबुक की समस्याएँ देखो (जो मीरा ने लिस्ट बनाई)। इनमें से कौन सी समस्याएँ तुम्हारी नोटबुक में भी हैं? तुम उन्हें कैसे ठीक करोगे?
मज़ेदार तथ्य — दुनिया के सबसे पुराने अकाउंट्स
क्या तुम्हें पता है कि अकाउंटिंग दुनिया के सबसे पुराने हुनर में से एक है? प्राचीन मेसोपोटेमिया (आज का इराक़) में लोग 5,000 साल पहले मिट्टी की टैबलेट्स पर अकाउंट्स रखते थे! वो लिखते थे कि कितने बोरे अनाज हैं, कितनी भेड़ें बेचीं, और किसका कितना बाक़ी है।
इंडिया में कौटिल्य के अर्थशास्त्र (लगभग 300 ईसा पूर्व लिखा गया) में विस्तार से बताया गया है कि एक राज्य को अपने अकाउंट्स कैसे रखने चाहिए। तो जब तुम अकाउंटिंग सीखते हो, तो एक ऐसा हुनर सीख रहे हो जो हज़ारों साल पुराना है — और आज भी धरती पर सबसे काम के हुनर में से एक है।
और सबसे अच्छी बात: अकाउंटिंग की माँग कभी ख़त्म नहीं होगी। जब तक लोग बिज़नेस करेंगे, उन्हें किसी ना किसी की ज़रूरत होगी जो उनका हिसाब-किताब रखे। वो कोई तुम हो सकते हो।
कल, मीरा अकाउंटिंग की सबसे बुनियादी ईंट सीखेगी — ट्रांज़ैक्शन। असल में ट्रांज़ैक्शन किसे कहते हैं? चलो पता करते हैं।